Private School Students Free Education Update (14 January 2026): गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा को लेकर Supreme Court of India ने एक बार फिर अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अब प्राइवेट स्कूल भी कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने से मना नहीं कर सकते। यह आदेश Right to Education Act की धारा 12(1)(c) की व्याख्या के दौरान दिया गया है।
25% सीटों पर देना होगा अनिवार्य एडमिशन
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देश के सभी प्राइवेट और गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को कक्षा 1 या प्री-प्राइमरी स्तर पर कम से कम 25% सीटें समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होंगी। कोर्ट के अनुसार यह केवल औपचारिक नियम नहीं है, बल्कि इसे अनुच्छेद 21-A (शिक्षा का अधिकार) के तहत सख्ती से लागू करना राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है।
पड़ोस के स्कूल एडमिशन से इनकार नहीं कर सकते
कोर्ट ने कहा कि “Neighbourhood School” की अवधारणा के तहत, आस-पास के स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी पात्र बच्चा सिर्फ गरीबी या सामाजिक स्थिति के कारण एडमिशन से वंचित न रहे। अगर कोई स्कूल आरटीई के तहत एडमिशन देने से मना करता है, तो यह कानून का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
सरकार करेगी प्रति बच्चे खर्च का रीइम्बर्समेंट
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि 25% कोटा के तहत एडमिशन पाने वाले छात्रों पर होने वाला खर्च राज्य सरकार द्वारा स्कूलों को रीइम्बर्स किया जाएगा। यानी प्राइवेट स्कूल यह बहाना नहीं बना सकते कि उन्हें आर्थिक नुकसान होगा।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग भी बना पक्ष
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने National Commission for Protection of Child Rights को भी पक्षकार बनाया है और उनसे इस मामले में हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
कोर्ट ने अनुपालन की समीक्षा के लिए इस केस को फिलहाल लंबित रखा है।
न्यायाधीशों की पीठ का अहम संदेश
पीठ ने कहा कि अगर आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c) को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो यह भारत की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव ला सकती है। यह कदम न केवल शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज में समानता और अवसर की भावना को भी मजबूत करता है।
आवेदन न करने पर अभिभावकों की भी जिम्मेदारी
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई पात्र अभिभावक समय पर अपने बच्चे का आवेदन 25% कोटा के तहत नहीं करता और बाद में शिकायत करता है, तो इसके लिए वह स्वयं भी जिम्मेदार होगा। अर्थात, सरकार और स्कूलों के साथ-साथ अभिभावकों की जागरूकता भी जरूरी है।
केस डिटेल
यह पूरा मामला Supreme Court of India में
दिनेश बीवाजी अष्टिकर बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र एवं अन्य
SLP (C) No. 10105/2017 से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन लाखों गरीब बच्चों के लिए राहत की खबर है जो अब तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने का सपना नहीं देख पाते थे। अब साफ है—मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा केवल कागजों में नहीं, ज़मीन पर लागू करनी होगी।
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